श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

भ्रातुर्विरूपकरणं युधि निर्जितस्य

प्रोद्वाहपर्वणि च तद्वधमक्षगोष्ठ्याम्।

दुःखं समुत्थमसहोऽस्मदयोगभीत्या

नैवाब्रवीः किमपि तेन वयं जितास्ते॥ ५६

bhrāturvirūpakaraṇaṃ yudhi nirjitasya

prodvāhaparvaṇi ca tadvadhamakṣagoṣṭhyām|

duḥkhaṃ samutthamasaho'smadayogabhītyā

naivābravīḥ kimapi tena vayaṃ jitāste|| 56

अर्थ

तुम्हारा हरण करते समय मैंने तुम्हारे भाईको युद्धमें जीतकर उसे विरूप कर दिया था और अनिरुद्धके विवाहोत्सवमें चौसर खेलते समय बलरामजीने तो उसे मार ही डाला। किन्तु हमसे वियोग हो जानेकी आशंकासे तुमने चुपचाप वह सारा दुःख सह लिया। मुझसे एक बात भी नहीं कही। तुम्हारे इस गुणसे मैं तुम्हारे वश हो गया हूँ॥ ५६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें