श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

दूतस्त्वयाऽऽत्मलभने सुविविक्तमन्त्रः

प्रस्थापितो मयि चिरायति शून्यमेतत्।

मत्वा जिहास इदमंगमनन्ययोग्यं

तिष्ठेत तत्त्वयि वयं प्रतिनन्दयामः॥ ५७

dūtastvayā''tmalabhane suviviktamantraḥ

prasthāpito mayi cirāyati śūnyametat|

matvā jihāsa idamaṃgamananyayogyaṃ

tiṣṭheta tattvayi vayaṃ pratinandayāmaḥ|| 57

अर्थ

तुमने मेरी प्राप्तिके लिये दूतके द्वारा अपना गुप्त सन्देश भेजा था; परन्तु जब तुमने मेरे पहुँचनेमें कुछ विलम्ब होता देखा; तब तुम्हें यह सारा संसार सूना दीखने लगा। उस समय तुमने अपना यह सर्वांगसुन्दर शरीर किसी दूसरेके योग्य न समझकर इसे छोड़नेका संकल्प कर लिया था। तुम्हारा यह प्रेमभाव तुम्हारे ही अंदर रहे। हम इसका बदला नहीं चुका सकते। तुम्हारे इस सर्वोच्च प्रेम-भावका केवल अभिनन्दन करते हैं॥ ५७॥

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