श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे जब मनुष्योंकी-सी लीला कर रहे हैं, तब उसमें दाम्पत्य-प्रेमको बढ़ानेवाले विनोदभरे वार्तालाप भी करते हैं और इस प्रकार लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीके साथ विहार करते हैं॥ ५८॥
एवं सौरतसंलापैर्भगवान् जगदीश्वरः।
स्वरतो रमया रेमे नरलोकं विडम्बयन्॥ ५८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे जब मनुष्योंकी-सी लीला कर रहे हैं, तब उसमें दाम्पत्य-प्रेमको बढ़ानेवाले विनोदभरे वार्तालाप भी करते हैं और इस प्रकार लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीके साथ विहार करते हैं॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 520) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/60/58/