॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.61.3
चार्वब्जकोशवदनायतबाहुनेत्र-
सप्रेमहासरसवीक्षितवल्गुजल्पैः ।
सम्मोहिता भगवतो न मनो विजेतुं
स्वैर्विभ्रमैः समशकन् वनिता विभूम्नः॥ ३
cārvabjakośavadanāyatabāhunetra-
sapremahāsarasavīkṣitavalgujalpaiḥ |
sammohitā bhagavato na mano vijetuṃ
svairvibhramaiḥ samaśakan vanitā vibhūmnaḥ|| 3
अर्थ
वे सुन्दरियाँ अपने आत्मानन्दमें एकरस स्थित भगवान् श्रीकृष्णके कमल-कलीके समान सुन्दर मुख, विशाल बाहु, कर्णस्पर्शी नेत्र, प्रेमभरी मुसकान, रसमयी चितवन और मधुर वाणीसे स्वयं ही मोहित रहती थीं। वे अपने शृंगारसम्बन्धी हावभावोंसे उनके मनको अपनी ओर खींचनेमें समर्थ न हो सकीं॥ ३॥