प्रेष्ठं न्यमंसत स्वं स्वं न तत्तत्त्वविदः स्त्रियः॥ २
gṛhādanapagaṃ vīkṣya rājaputryo'cyutaṃ sthitam|
preṣṭhaṃ nyamaṃsata svaṃ svaṃ na tattattvavidaḥ striyaḥ|| 2
अर्थ
राजकुमारियाँ देखतीं कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे महलसे कभी बाहर नहीं जाते। सदा हमारे ही पास बने रहते हैं। इससे वे यही समझतीं कि श्रीकृष्णको मैं ही सबसे प्यारी हूँ। परीक्षित्! सच पूछो तो वे अपने पति भगवान् श्रीकृष्णका तत्त्व—उनकी महिमा नहीं समझती थीं॥ २॥
गृहादनपगं वीक्ष्य राजपुत्र्योऽच्युतं स्थितम्।
प्रेष्ठं न्यमंसत स्वं स्वं न तत्तत्त्वविदः स्त्रियः॥ २
राजकुमारियाँ देखतीं कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे महलसे कभी बाहर नहीं जाते। सदा हमारे ही पास बने रहते हैं। इससे वे यही समझतीं कि श्रीकृष्णको मैं ही सबसे प्यारी हूँ। परीक्षित्! सच पूछो तो वे अपने पति भगवान् श्रीकृष्णका तत्त्व—उनकी महिमा नहीं समझती थीं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 520) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/61/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)