॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.61.31
मन्युना क्षुभितः श्रीमान् समुद्र इव पर्वणि।
जात्यारुणाक्षोऽतिरुषा न्यर्बुदं ग्लहमाददे॥ ३१
manyunā kṣubhitaḥ śrīmān samudra iva parvaṇi|
jātyāruṇākṣo'tiruṣā nyarbudaṃ glahamādade|| 31
अर्थ
इसपर श्रीमान् बलरामजी क्रोधसे तिलमिला उठे। उनके हृदयमें इतना क्षोभ हुआ, मानो पूर्णिमाके दिन समुद्रमें ज्वार आ गया हो। उनके नेत्र एक तो स्वभावसे ही लाल-लाल थे, दूसरे अत्यन्त क्रोधके मारे वे और भी दहक उठे। अब उन्होंने दस करोड़ मुहरोंका दाँव रखा॥ ३१॥