पहले कलिंगनरेश दाँत दिखा-दिखाकर हँसता था, अब रंगमें भंग देखकर वहाँसे भागा; परन्तु बलरामजीने दस ही कदमपर उसे पकड़ लिया और क्रोधसे उसके दाँत तोड़ डाले॥ ३७॥✎ 1696
कलिंगराजं तरसा गृहीत्वा दशमे पदे।
दन्तानपातयत् क्रुद्धो योऽहसद् विवृतैर्द्विजैः॥ ३७
पहले कलिंगनरेश दाँत दिखा-दिखाकर हँसता था, अब रंगमें भंग देखकर वहाँसे भागा; परन्तु बलरामजीने दस ही कदमपर उसे पकड़ लिया और क्रोधसे उसके दाँत तोड़ डाले॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 524) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/61/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)