श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

रुक्मिणैवमधिक्षिप्तो राजभिश्‍चोपहासितः।

क्रुद्धः परिघमुद्यम्य जघ्ने तं नृम्णसंसदि॥ ३६

rukmiṇaivamadhikṣipto rājabhiścopahāsitaḥ|

kruddhaḥ parighamudyamya jaghne taṃ nṛmṇasaṃsadi|| 36

अर्थ

रुक्मीके इस प्रकार आक्षेप और राजाओंके उपहास करनेपर बलरामजी क्रोधसे आगबबूला हो उठे। उन्होंने एक मुद्गर उठाया और उस मांगलिक सभामें ही रुक्मीको मार डाला॥ ३६॥✎ 1696

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1696 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: धर्म-पूर्वक → धर्मपूर्वक

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