स्वप्नमें ही उन्हें न देखकर वह बोल उठी—‘प्राणप्यारे! तुम कहाँ हो?’ और उसकी नींद टूट गयी। वह अत्यन्त विह्वलताके साथ उठ बैठी और यह देखकर कि मैं सखियोंके बीचमें हूँ, बहुत ही लज्जित हुई॥ १३॥
सा तत्र तमपश्यन्ती क्वासि कान्तेति वादिनी।
सखीनां मध्य उत्तस्थौ विह्वला व्रीडिता भृशम्॥ १३
स्वप्नमें ही उन्हें न देखकर वह बोल उठी—‘प्राणप्यारे! तुम कहाँ हो?’ और उसकी नींद टूट गयी। वह अत्यन्त विह्वलताके साथ उठ बैठी और यह देखकर कि मैं सखियोंके बीचमें हूँ, बहुत ही लज्जित हुई॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.62.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 526) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/62/13/