उन दिनों वह परम रमणीय शोणितपुरमें राज्य करता था। भगवान् शंकरकी कृपासे इन्द्रादि देवता नौकर-चाकरकी तरह उसकी सेवा करते थे। उसके हजार भुजाएँ थीं। एक दिन जब भगवान् शंकर ताण्डवनृत्य कर रहे थे, तब उसने अपने हजार हाथोंसे अनेकों प्रकारके बाजे बजाकर उन्हें प्रसन्न कर लिया॥ ४॥
शोणिताख्ये पुरे रम्ये स राज्यमकरोत् पुरा।
तस्य शम्भोः प्रसादेन किंकरा इव तेऽमराः।
सहस्रबाहुर्वाद्येन ताण्डवेऽतोषयन्मृडम्॥ ४
उन दिनों वह परम रमणीय शोणितपुरमें राज्य करता था। भगवान् शंकरकी कृपासे इन्द्रादि देवता नौकर-चाकरकी तरह उसकी सेवा करते थे। उसके हजार भुजाएँ थीं। एक दिन जब भगवान् शंकर ताण्डवनृत्य कर रहे थे, तब उसने अपने हजार हाथोंसे अनेकों प्रकारके बाजे बजाकर उन्हें प्रसन्न कर लिया॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.62.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 525) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/62/4/