अन्तमें वैष्णव ज्वरके तेजसे माहेश्वर ज्वर पीड़ित होकर चिल्लाने लगा और अत्यन्त भयभीत हो गया। जब उसे अन्यत्र कहीं त्राण न मिला, तब वह अत्यन्त नम्रतासे हाथ जोड़कर शरणमें लेनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना करने लगा॥ २४॥✎ 2123
माहेश्वरः समाक्रन्दन् वैष्णवेन बलार्दितः।
अलब्ध्वाभयमन्यत्र भीतो माहेश्वरो ज्वरः।
शरणार्थी हृषीकेशं तुष्टाव प्रयतांजलिः॥ २४
अन्तमें वैष्णव ज्वरके तेजसे माहेश्वर ज्वर पीड़ित होकर चिल्लाने लगा और अत्यन्त भयभीत हो गया। जब उसे अन्यत्र कहीं त्राण न मिला, तब वह अत्यन्त नम्रतासे हाथ जोड़कर शरणमें लेनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना करने लगा॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.63.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 532) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/63/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)