श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

गोभूहिरण्यायतनाश्‍वहस्तिनः

कन्याः सदासीस्तिलरूप्यशय्याः।

वासांसि रत्‍नानि परिच्छदान् रथा-

निष्टं च यज्ञैश्‍चरितं च पूर्तम्॥ १५

gobhūhiraṇyāyatanāśvahastinaḥ

kanyāḥ sadāsīstilarūpyaśayyāḥ|

vāsāṃsi ratnāni paricchadān rathā-

niṣṭaṃ ca yajñaiścaritaṃ ca pūrtam|| 15

अर्थ

इस प्रकार मैंने बहुत-सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड़े, हाथी, दासियोंके सहित कन्याएँ, तिलोंके पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्‍न, गृह-सामग्री और रथ आदि दान किये। अनेकों यज्ञ किये और बहुत-से कूएँ, बावली आदि बनवाये॥ १५॥

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