एक दिन किसी अप्रतिग्रही (दान न लेनेवाले), तपस्वी ब्राह्मणकी एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओंमें आ मिली। मुझे इस बातका बिलकुल पता न चला। इसलिये मैंने अनजानमें उसे किसी दूसरे ब्राह्मणको दान कर दिया॥ १६॥
कस्यचिद् द्विजमुख्यस्य भ्रष्टा गौर्मम गोधने।
सम्पृक्ताविदुषा सा च मया दत्ता द्विजातये॥ १६
एक दिन किसी अप्रतिग्रही (दान न लेनेवाले), तपस्वी ब्राह्मणकी एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओंमें आ मिली। मुझे इस बातका बिलकुल पता न चला। इसलिये मैंने अनजानमें उसे किसी दूसरे ब्राह्मणको दान कर दिया॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/16/