श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

दुर्जरं बत ब्रह्मस्वं भुक्तम‌ग्‍नेर्मनागपि।

तेजीयसोऽपि किमुत राज्ञामीश्‍वरमानिनाम्॥ ३२

durjaraṃ bata brahmasvaṃ bhuktamagnermanāgapi|

tejīyaso'pi kimuta rājñāmīśvaramāninām|| 32

अर्थ

‘जो लोग अग्‍निके समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राह्मणोंका थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते। फिर जो अभिमानवश झूठ-मूठ अपनेको लोगोंका स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं?॥ ३२॥✎ 1698 2124 2125 2126

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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