ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि॥ ३३
nāhaṃ hālāhalaṃ manye viṣaṃ yasya pratikriyā|
brahmasvaṃ hi viṣaṃ proktaṃ nāsya pratividhirbhuvi|| 33
अर्थ
मैं हलाहल विषको विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राह्मणोंका धन ही परम विष है; उसको पचा लेनेके लिये पृथ्वीमें कोई औषध, कोई उपाय नहीं है॥ ३३॥✎ 1698212421252126
नाहं हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया।
ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि॥ ३३
मैं हलाहल विषको विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राह्मणोंका धन ही परम विष है; उसको पचा लेनेके लिये पृथ्वीमें कोई औषध, कोई उपाय नहीं है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 540) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)