श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

न मे ब्रह्मधनं भूयाद् यद् गृद‍्ध्वाल्पायुषो नराः१।

पराजिताश्‍च्युता राज्याद् भवन्त्युद्वेजिनोऽहयः२॥ ४०

na me brahmadhanaṃ bhūyād yad gṛddhvālpāyuṣo narāḥ|

parājitāścyutā rājyād bhavantyudvejino'hayaḥ|| 40

अर्थ

इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंका धन कभी भूलसे भी मेरे कोषमें न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणोंके धनकी इच्छा भी करते हैं—उसे छीननेकी बात तो अलग रही—वे इस जन्ममें अल्पायु, शत्रुओंसे पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्युके बाद भी वे दूसरोंको कष्ट देनेवाले साँप ही होते हैं॥ ४०॥✎ 1698 2124 2125 2126

टिप्पणियाँ

  1. १

    नृपाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 541)
  2. २

    हि ये।

    (मुद्रित पृष्ठ 541)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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