श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

विप्रं कृतागसमपि नैव द्रुह्यत मामकाः।

घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः॥ ४१

vipraṃ kṛtāgasamapi naiva druhyata māmakāḥ|

ghnantaṃ bahu śapantaṃ vā namaskuruta nityaśaḥ|| 41

अर्थ

इसलिये मेरे आत्मीयो! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुमलोग सदा नमस्कार ही करो॥ ४१॥✎ 1698 2124 2125 2126

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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