श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

पूर्णचन्द्रकलामृष्टे कौमुदीगन्धवायुना।

यमुनोपवने रेमे सेविते स्त्रीगणैर्वृतः॥ १८

pūrṇacandrakalāmṛṣṭe kaumudīgandhavāyunā|

yamunopavane reme sevite strīgaṇairvṛtaḥ|| 18

अर्थ

उस समय कुमुदिनीकी सुगन्ध लेकर भीनी-भीनी वायु चलती रहती, पूर्ण चन्द्रमाकी चाँदनी छिटककर यमुनाजीके तटवर्ती उपवनको उज्ज्वल कर देती और भगवान् बलराम गोपियोंके साथ वहीं विहार करते॥ १८॥

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