उसने रेशमी पीले वस्त्र पहन रखे थे और रथकी ध्वजापर गरुड़का चिह्न भी लगा रखा था। उसके सिरपर अमूल्य मुकुट था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल जगमगा रहे थे॥ १४॥✎ 1700
कौशेयवाससी पीते वसानं गरुडध्वजम्।
अमूल्यमौल्याभरणं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ १४
उसने रेशमी पीले वस्त्र पहन रखे थे और रथकी ध्वजापर गरुड़का चिह्न भी लगा रखा था। उसके सिरपर अमूल्य मुकुट था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल जगमगा रहे थे॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 547) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)