श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

स नित्यं भगवद्ध्यानप्रध्वस्ताखिलबन्धनः।

बिभ्राणश्‍च हरे राजन् स्वरूपं तन्मयोऽभवत्॥ २४

sa nityaṃ bhagavaddhyānapradhvastākhilabandhanaḥ|

bibhrāṇaśca hare rājan svarūpaṃ tanmayo'bhavat|| 24

अर्थ

परीक्षित्! पौण्ड्रक भगवान्‌के रूपका, चाहे वह किसी भावसे हो, सदा चिन्तन करता रहता था। इससे उसके सारे बन्धन कट गये। वह भगवान्‌का बनावटी वेष धारण किये रहता था, इससे बार-बार उसीका स्मरण होनेके कारण वह भगवान्‌के सारूप्यको ही प्राप्त हुआ॥ २४॥

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