काशी नगरीमें उसकी आराधनासे प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने वर देनेको कहा। सुदक्षिणने यह अभीष्ट वर माँगा कि मुझे मेरे पितृघातीके वधका उपाय बतलाइये॥ २९॥✎ 8931953
प्रीतोऽविमुक्ते भगवांस्तस्मै वरमदाद् भवः।
पितृहन्तृवधोपायं स वव्रे वरमीप्सितम्॥ २९
काशी नगरीमें उसकी आराधनासे प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने वर देनेको कहा। सुदक्षिणने यह अभीष्ट वर माँगा कि मुझे मेरे पितृघातीके वधका उपाय बतलाइये॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 549) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)