श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

प्रीतोऽविमुक्ते भगवांस्तस्मै वरमदाद् भवः।

पितृहन्तृवधोपायं स वव्रे वरमीप्सितम्॥ २९

prīto'vimukte bhagavāṃstasmai varamadād bhavaḥ|

pitṛhantṛvadhopāyaṃ sa vavre varamīpsitam|| 29

अर्थ

काशी नगरीमें उसकी आराधनासे प्रसन्‍न होकर भगवान् शंकरने वर देनेको कहा। सुदक्षिणने यह अभीष्ट वर माँगा कि मुझे मेरे पितृघातीके वधका उपाय बतलाइये॥ २९॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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