श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

दक्षिणाग्‍निं परिचर ब्राह्मणैः सममृत्विजम्।

अभिचारविधानेन स चाग्‍निः प्रमथैर्वृतः॥ ३०

dakṣiṇāgniṃ paricara brāhmaṇaiḥ samamṛtvijam|

abhicāravidhānena sa cāgniḥ pramathairvṛtaḥ|| 30

अर्थ

भगवान् शंकरने कहा—‘तुम ब्राह्मणोंके साथ मिलकर यज्ञके देवता ऋत्विग्भूत दक्षिणाग्‍निकी अभिचारविधिसे आराधना करो। इससे वह अग्‍नि प्रमथगणोंके साथ प्रकट होकर यदि ब्राह्मणोंके अभक्तपर प्रयोग करोगे तो वह तुम्हारा संकल्प सिद्ध करेगा।’ भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्त करके सुदक्षिणने अनुष्ठानके उपयुक्त नियम ग्रहण किये और वह भगवान् श्रीकृष्णके लिये अभिचार (मारणका पुरश्‍चरण) करने लगा॥ ३०-३१॥✎ 893 1953

यह अर्थ श्लोक 30–31 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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