श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

पद‍्भ्यां तालप्रमाणाभ्यां कम्पयन्‍नवनीतलम्।

सोऽभ्यधावद् वृतो भूतैर्द्वारकां प्रदहन् दिशः॥ ३४

padbhyāṃ tālapramāṇābhyāṃ kampayannavanītalam|

so'bhyadhāvad vṛto bhūtairdvārakāṃ pradahan diśaḥ|| 34

अर्थ

ताड़के पेड़के समान बड़ी-बड़ी टाँगें थीं। वह अपने वेगसे धरतीको कँपाता हुआ और ज्वालाओंसे दसों दिशाओंको दग्ध करता हुआ द्वारकाकी ओर दौड़ा और बात-की-बातमें द्वारकाके पास जा पहुँचा। उसके साथ बहुत-से भूत भी थे॥ ३४॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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