॥ श्रीहरिः ॥
तमाभिचारदहनमायान्तं द्वारकौकसः।
विलोक्य तत्रसुः सर्वे वनदाहे मृगा यथा॥ ३५
tamābhicāradahanamāyāntaṃ dvārakaukasaḥ|
vilokya tatrasuḥ sarve vanadāhe mṛgā yathā|| 35
अर्थ
उस अभिचारकी आगको बिलकुल पास आयी हुई देख द्वारकावासी वैसे ही डर गये, जैसे जंगलमें आग लगनेपर हरिन डर जाते हैं॥ ३५॥✎ 893 1953
तमाभिचारदहनमायान्तं द्वारकौकसः।
विलोक्य तत्रसुः सर्वे वनदाहे मृगा यथा॥ ३५
उस अभिचारकी आगको बिलकुल पास आयी हुई देख द्वारकावासी वैसे ही डर गये, जैसे जंगलमें आग लगनेपर हरिन डर जाते हैं॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 549) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्से
- #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण