श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

श्रुत्वा तज्जनवैक्लव्यं दृष्ट्वा स्वानां च साध्वसम्।

शरण्यः सम्प्रहस्याह मा भैष्टेत्यवितास्म्यहम्॥ ३७

śrutvā tajjanavaiklavyaṃ dṛṣṭvā svānāṃ ca sādhvasam|

śaraṇyaḥ samprahasyāha mā bhaiṣṭetyavitāsmyaham|| 37

अर्थ

शरणागतवत्सल भगवान्‌ने देखा कि हमारे स्वजन भयभीत हो गये हैं और पुकार-पुकारकर विकलताभरे स्वरसे हमारी प्रार्थना कर रहे हैं; तब उन्होंने हँसकर कहा—‘डरो मत, मैं तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा’॥ ३७॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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