बेचारे यदुवंशी तो कौरवोंका दिया हुआ पृथ्वीका एक टुकड़ा भोगते हैं। क्या खूब! हमलोग जूती हैं और ये कुरुवंशी स्वयं सिर हैं॥ ३८॥
भुंजते कुरुभिर्दत्तं भूखण्डं वृष्णयः किल।
उपानहः किल वयं स्वयं तु कुरवः शिरः॥ ३८
बेचारे यदुवंशी तो कौरवोंका दिया हुआ पृथ्वीका एक टुकड़ा भोगते हैं। क्या खूब! हमलोग जूती हैं और ये कुरुवंशी स्वयं सिर हैं॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 558) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/38/