श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

भुंजते कुरुभिर्दत्तं भूखण्डं वृष्णयः किल।

उपानहः किल वयं स्वयं तु कुरवः शिरः॥ ३८

bhuṃjate kurubhirdattaṃ bhūkhaṇḍaṃ vṛṣṇayaḥ kila|

upānahaḥ kila vayaṃ svayaṃ tu kuravaḥ śiraḥ|| 38

अर्थ

बेचारे यदुवंशी तो कौरवोंका दिया हुआ पृथ्वीका एक टुकड़ा भोगते हैं। क्या खूब! हमलोग जूती हैं और ये कुरुवंशी स्वयं सिर हैं॥ ३८॥

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