॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.68.39
अहो ऐश्वर्यमत्तानां मत्तानामिव मानिनाम्।
असम्बद्धा गिरो रूक्षाः कः सहेतानुशासिता॥ ३९
aho aiśvaryamattānāṃ mattānāmiva māninām|
asambaddhā giro rūkṣāḥ kaḥ sahetānuśāsitā|| 39
अर्थ
ये लोग ऐश्वर्यसे उन्मत्त, घमंडी कौरव पागल-सरीखे हो रहे हैं। इनकी एक-एक बात कटुतासे भरी और बेसिर-पैरकी है। मेरे जैसा पुरुष—जो इनका शासन कर सकता है, इन्हें दण्ड देकर इनके होश ठिकाने ला सकता है—भला इनकी बातोंको कैसे सहन कर सकता है?॥ ३९॥