श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

त्वमेव मूर्ध्नीदमनन्त लीलया

भूमण्डलं बिभर्षि सहस्रमूर्धन्।

अन्ते च यः स्वात्मनि रुद्धविश्‍वः

शेषेऽद्वितीयः परिशिष्यमाणः॥ ४६

tvameva mūrdhnīdamananta līlayā

bhūmaṇḍalaṃ bibharṣi sahasramūrdhan|

ante ca yaḥ svātmani ruddhaviśvaḥ

śeṣe'dvitīyaḥ pariśiṣyamāṇaḥ|| 46

अर्थ

अनन्त! आपके सहस्र-सहस्र सिर हैं और आप खेल-खेलमें ही इस भूमण्डलको अपने सिरपर रखे रहते हैं। जब प्रलयका समय आता है, तब आप सारे जगत‍्को अपने भीतर लीन कर लेते हैं और केवल आप ही बचे रहकर अद्वितीयरूपसे शयन करते हैं॥ ४६॥

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