भगवन्! आप जगत्की स्थिति और पालनके लिये विशुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण किये हुए हैं। आपका यह क्रोध द्वेष या मत्सरके कारण नहीं है। यह तो समस्त प्राणियोंको शिक्षा देनेके लिये है॥ ४७॥
कोपस्तेऽखिलशिक्षार्थं न द्वेषान्न च मत्सरात्।
बिभ्रतो भगवन् सत्त्वं स्थितिपालनतत्परः॥ ४७
भगवन्! आप जगत्की स्थिति और पालनके लिये विशुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण किये हुए हैं। आपका यह क्रोध द्वेष या मत्सरके कारण नहीं है। यह तो समस्त प्राणियोंको शिक्षा देनेके लिये है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 559) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/68/47/