इसके बाद भगवान्ने नारदजीसे अनजानकी तरह पूछा—‘आप यहाँ कब पधारे! आप तो परिपूर्ण आत्माराम—आप्तकाम हैं और हमलोग हैं अपूर्ण। ऐसी अवस्थामें भला हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं॥ २१॥✎ 1705
पृष्टश्चाविदुषेवासौ कदाऽऽयातो भवानिति।
क्रियते किं नु पूर्णानामपूर्णैरस्मदादिभिः॥ २१
इसके बाद भगवान्ने नारदजीसे अनजानकी तरह पूछा—‘आप यहाँ कब पधारे! आप तो परिपूर्ण आत्माराम—आप्तकाम हैं और हमलोग हैं अपूर्ण। ऐसी अवस्थामें भला हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 563) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)