कहीं सन्ध्या कर रहे हैं, तो कहीं मौन होकर गायत्रीका जप कर रहे हैं। कहीं हाथोंमें ढाल-तलवार लेकर उनको चलानेके पैतरे बदल रहे हैं॥ २५॥✎ 1705
क्वापि सन्ध्यामुपासीनं जपन्तं ब्रह्म वाग्यतम्।
एकत्र चासिचर्मभ्यां चरन्तमसिवर्त्मसु॥ २५
कहीं सन्ध्या कर रहे हैं, तो कहीं मौन होकर गायत्रीका जप कर रहे हैं। कहीं हाथोंमें ढाल-तलवार लेकर उनको चलानेके पैतरे बदल रहे हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 564) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/69/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)