juhvantaṃ ca vitānāgnīn yajantaṃ pañcabhirmakhaiḥ|
bhojayantaṃ dvijān kvāpi bhuñjānamavaśeṣitam|| 24
अर्थ
(इसी प्रकार देवर्षि नारदने विभिन्न महलोंमें भगवान्को भिन्न-भिन्न कार्य करते देखा।) कहीं वे यज्ञकुण्डोंमें हवन कर रहे हैं तो कहीं पंचमहायज्ञोंसे देवता आदिकी आराधना कर रहे हैं। कहीं ब्राह्मणोंको भोजन करा रहे हैं, तो कहीं यज्ञका अवशेष स्वयं भोजन कर रहे हैं॥ २४॥✎ 1705
जुह्वन्तं च वितानाग्नीन् यजन्तं पञ्चभिर्मखैः।
भोजयन्तं द्विजान् क्वापि भुञ्जानमवशेषितम्॥ २४
(इसी प्रकार देवर्षि नारदने विभिन्न महलोंमें भगवान्को भिन्न-भिन्न कार्य करते देखा।) कहीं वे यज्ञकुण्डोंमें हवन कर रहे हैं तो कहीं पंचमहायज्ञोंसे देवता आदिकी आराधना कर रहे हैं। कहीं ब्राह्मणोंको भोजन करा रहे हैं, तो कहीं यज्ञका अवशेष स्वयं भोजन कर रहे हैं॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 564) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)