श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

अव्यक्तलिंगं प्रकृतिष्वन्तःपुरगृहादिषु।

क्वचिच्चरन्तं योगेशं तत्तद्भावबुभुत्सया॥ ३६

avyaktaliṃgaṃ prakṛtiṣvantaḥpuragṛhādiṣu|

kvaciccarantaṃ yogeśaṃ tattadbhāvabubhutsayā|| 36

अर्थ

और कहीं प्रजामें तथा अन्तःपुरके महलोंमें वेष बदलकर छिपे रूपसे सबका अभिप्राय जाननेके लिये विचरण कर रहे हैं। क्यों न हो, भगवान् योगेश्‍वर जो हैं॥ ३६॥

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