और कहीं प्रजामें तथा अन्तःपुरके महलोंमें वेष बदलकर छिपे रूपसे सबका अभिप्राय जाननेके लिये विचरण कर रहे हैं। क्यों न हो, भगवान् योगेश्वर जो हैं॥ ३६॥
अव्यक्तलिंगं प्रकृतिष्वन्तःपुरगृहादिषु।
क्वचिच्चरन्तं योगेशं तत्तद्भावबुभुत्सया॥ ३६
और कहीं प्रजामें तथा अन्तःपुरके महलोंमें वेष बदलकर छिपे रूपसे सबका अभिप्राय जाननेके लिये विचरण कर रहे हैं। क्यों न हो, भगवान् योगेश्वर जो हैं॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 565) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/69/36/