श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एकदार्भकमादाय स्वांकमारोप्य भामिनी।

प्रस्नुतं पाययामास स्तनं स्नेहपरिप्लुता॥ ३४

ekadārbhakamādāya svāṃkamāropya bhāminī|

prasnutaṃ pāyayāmāsa stanaṃ snehapariplutā|| 34

अर्थ

एक दिनकी बात है, यशोदाजी अपने प्यारे शिशुको अपनी गोदमें लेकर बड़े प्रेमसे स्तनपान करा रही थीं। वे वात्सल्य-स्नेहसे इस प्रकार सराबोर हो रही थीं कि उनके स्तनोंसे अपने-आप ही दूध झरता जा रहा था॥ ३४॥

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