॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.70.37
श्रीनारद उवाच
दृष्टा मया ते बहुशो दुरत्यया
माया विभो विश्वसृजश्च मायिनः।
भूतेषु भूमंश्चरतः स्वशक्तिभि-
र्वह्नेरिवच्छन्नरुचो न मेऽद्भुतम्॥ ३७
dṛṣṭā mayā te bahuśo duratyayā
māyā vibho viśvasṛjaśca māyinaḥ|
bhūteṣu bhūmaṃścarataḥ svaśaktibhi-
rvahnerivacchannaruco na me'dbhutam|| 37
अर्थ
देवर्षि नारदजीने कहा—सर्वव्यापक अनन्त! आप विश्वके निर्माता हैं और इतने बड़े मायावी हैं कि बड़े-बड़े मायावी ब्रह्माजी आदि भी आपकी मायाका पार नहीं पा सकते? प्रभो! आप सबके घट-घटमें अपनी अचिन्त्य शक्तिसे व्याप्त रहते हैं—ठीक वैसे ही; जैसे अग्नि लकड़ियोंमें अपनेको छिपाये रखता है। लोगोंकी दृष्टि सत्त्व आदि गुणोंपर ही अटक जाती है, इससे आपको वे नहीं देख पाते। मैंने एक बार नहीं, अनेकों बार आपकी माया देखी है। इसलिये आप जो यों अनजान बनकर पाण्डवोंका समाचार पूछते हैं, इससे मुझे कोई कौतूहल नहीं हो रहा है॥ ३७॥✎ 2128