॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.71.14
ततो रथद्विपभटसादिनायकैः
करालया परिवृत आत्मसेनया।
मृदंगभेर्यानकशंखगोमुखैः
प्रघोषघोषितककुभो निराक्रमत्॥ १४
tato rathadvipabhaṭasādināyakaiḥ
karālayā parivṛta ātmasenayā|
mṛdaṃgabheryānakaśaṃkhagomukhaiḥ
praghoṣaghoṣitakakubho nirākramat|| 14
अर्थ
इसके बाद रथों, हाथियों, घुड़सवारों और पैदलोंकी बड़ी भारी सेनाके साथ उन्होंने प्रस्थान किया। उस समय मृदंग, नगारे, ढोल, शंख और नरसिंगोंकी ऊँची ध्वनिसे दसों दिशाएँ गूँज उठीं॥ १४॥