इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण राजपथसे चल रहे थे। स्थान-स्थानपर बहुत-से निष्पाप धनी-मानी और शिल्पजीवी नागरिकोंने अनेकों मांगलिक वस्तुएँ ला-लाकर उनकी पूजा-अर्चा और स्वागत-सत्कार किया॥ ३७॥✎ 2130
तत्र तत्रोपसंगम्य पौरा मंगलपाणयः।
चक्रुः सपर्यां कृष्णाय श्रेणीमुख्या हतैनसः॥ ३७
इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण राजपथसे चल रहे थे। स्थान-स्थानपर बहुत-से निष्पाप धनी-मानी और शिल्पजीवी नागरिकोंने अनेकों मांगलिक वस्तुएँ ला-लाकर उनकी पूजा-अर्चा और स्वागत-सत्कार किया॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.71.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 579) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/71/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)