॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.72.20
योऽनित्येन शरीरेण सतां गेयं यशो ध्रुवम्।
नाचिनोति स्वयं कल्पः स वाच्यः शोच्य एव सः॥ २०
yo'nityena śarīreṇa satāṃ geyaṃ yaśo dhruvam|
nācinoti svayaṃ kalpaḥ sa vācyaḥ śocya eva saḥ|| 20
अर्थ
जो पुरुष स्वयं समर्थ होकर भी इस नाशवान् शरीरसे ऐसे अविनाशी यशका संग्रह नहीं करता, जिसका बड़े-बड़े सत्पुरुष भी गान करें; सच पूछिये तो उसकी जितनी निन्दा की जाय, थोड़ी है। उसका जीवन शोक करनेयोग्य है॥ २०॥