दोनों वीर रातके समय मित्रके समान रहते और दिनमें छूटकर एक-दूसरेपर प्रहार करते और लड़ते। महाराज! इस प्रकार उनके लड़ते-लड़ते सत्ताईस दिन बीत गये॥ ४०॥
एवं तयोर्महाराज युध्यतोः सप्तविंशतिः।
दिनानि निरगंस्तत्र सुहृद्वन्निशि तिष्ठतोः॥ ४०
दोनों वीर रातके समय मित्रके समान रहते और दिनमें छूटकर एक-दूसरेपर प्रहार करते और लड़ते। महाराज! इस प्रकार उनके लड़ते-लड़ते सत्ताईस दिन बीत गये॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 585) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/72/40/