श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

दिष्ट्या व्यवसितं भूपा भवन्त ऋतभाषिणः।

श्रियैश्‍वर्यमदोन्‍नाहं पश्य उन्मादकं नृणाम्॥ १९

diṣṭyā vyavasitaṃ bhūpā bhavanta ṛtabhāṣiṇaḥ|

śriyaiśvaryamadonnāhaṃ paśya unmādakaṃ nṛṇām|| 19

अर्थ

नरपतियो! तुमलोगोंने जो निश्‍चय किया है, वह सचमुच तुम्हारे लिये बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है। तुमलोगोंने मुझसे जो कुछ कहा है, वह बिलकुल ठीक है। क्योंकि मैं देखता हूँ, धन-सम्पत्ति और ऐश्‍वर्यके मदसे चूर होकर बहुत-से लोग उच्छृंखल और मतवाले हो जाते हैं॥ १९॥✎ 1710

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1710 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

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