श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा यज्ञदिदृक्षवः।

तत्रेयुः सर्वराजानो राज्ञां प्रकृतयो नृप॥ ११

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā yajñadidṛkṣavaḥ|

tatreyuḥ sarvarājāno rājñāṃ prakṛtayo nṛpa|| 11

अर्थ

राजन्! राजसूय-यज्ञका दर्शन करनेके लिये देशके सब राजा, उनके मन्त्री तथा कर्मचारी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सब-के-सब वहाँ आये॥ ११॥✎ 1712

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1712 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भीष्म-पितामह, → भीष्मपितामह,

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें