श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

ततस्ते देवयजनं ब्राह्मणाः स्वर्णलांगलैः।

कृष्ट्वा तत्र यथाम्‍नायं दीक्षयांचक्रिरे नृपम्॥ १२

tataste devayajanaṃ brāhmaṇāḥ svarṇalāṃgalaiḥ|

kṛṣṭvā tatra yathāmnāyaṃ dīkṣayāṃcakrire nṛpam|| 12

अर्थ

इसके बाद ऋत्विज् ब्राह्मणोंने सोनेके हलोंसे यज्ञभूमिको जुतवाकर राजा युधिष्ठिरको शास्त्रानुसार यज्ञकी दीक्षा दी॥ १२॥

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