श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

तत्पादाववनिज्यापः शिरसा लोकपावनीः।

सभार्यः सानुजामात्यः१ सकुटुम्बोऽवहन्मुदा॥ २७

tatpādāvavanijyāpaḥ śirasā lokapāvanīḥ|

sabhāryaḥ sānujāmātyaḥ sakuṭumbo'vahanmudā|| 27

अर्थ

अपनी पत्‍नी, भाई, मन्त्री और कुटुम्बियोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरने बड़े प्रेम और आनन्दसे भगवान्‌के पाँव पखारे तथा उनके चरणकमलोंका लोकपावन जल अपने सिरपर धारण किया॥ २७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    जोऽव्यग्रः।

    (मुद्रित पृष्ठ 594)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें