॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.74.46
जन्मत्रयानुगुणितवैरसंरब्धया धिया।
ध्यायंस्तन्मयतां यातो भावो हि भवकारणम्॥ ४६
janmatrayānuguṇitavairasaṃrabdhayā dhiyā|
dhyāyaṃstanmayatāṃ yāto bhāvo hi bhavakāraṇam|| 46
अर्थ
परीक्षित्! शिशुपालके अन्तःकरणमें लगातार तीन जन्मसे वैरभावकी अभिवृद्धि हो रही थी। और इस प्रकार, वैरभावसे ही सही, ध्यान करते-करते वह तन्मय हो गया—पार्षद हो गया। सच है—मृत्युके बाद होनेवाली गतिमें भाव ही कारण है॥ ४६॥