शिशुपालकी सद्गति होनेके बाद चक्रवर्ती धर्मराज युधिष्ठिरने सदस्यों और ऋत्विजोंको पुष्कल दक्षिणा दी तथा सबका सत्कार करके विधिपूर्वक यज्ञान्त-स्नान—अवभृथ-स्नान किया॥ ४७॥
ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो दक्षिणां विपुलामदात्।
सर्वान् सम्पूज्य विधिवच्चक्रेऽवभृथमेकराट्॥ ४७
शिशुपालकी सद्गति होनेके बाद चक्रवर्ती धर्मराज युधिष्ठिरने सदस्यों और ऋत्विजोंको पुष्कल दक्षिणा दी तथा सबका सत्कार करके विधिपूर्वक यज्ञान्त-स्नान—अवभृथ-स्नान किया॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 596) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/74/47/