श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

ता देवरानुत सखीन् सिषिचुर्दृतीभिः

क्लिन्‍नाम्बरा विवृतगात्रकुचोरुमध्याः।

औत्सुक्यमुक्तकबराच्च्यवमानमाल्याः

क्षोभं दधुर्मलधियां रुचिरैर्विहारैः॥ १७

tā devarānuta sakhīn siṣicurdṛtībhiḥ

klinnāmbarā vivṛtagātrakucorumadhyāḥ|

autsukyamuktakabarāccyavamānamālyāḥ

kṣobhaṃ dadhurmaladhiyāṃ rucirairvihāraiḥ|| 17

अर्थ

उन लोगोंके रंग आदि डालनेसे रानियोंके वस्त्र भीग गये थे। इससे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंग—वक्षःस्थल, जंघा और कटिभाग कुछ-कुछ दीख-से रहे थे। वे भी पिचकारी और पात्रोंमें रंग भर-भरकर अपने देवरों और उनके सखाओंपर उड़ेल रही थीं। प्रेमभरी उत्सुकताके कारण उनकी चोटियों और जूड़ोंके बन्धन ढीले पड़ गये थे तथा उनमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे। परीक्षित्! उनका यह रुचिर और पवित्र विहार देखकर मलिन अन्तःकरणवाले पुरुषोंका चित्त चंचल हो उठता था, काम-मोहित हो जाता था॥ १७॥

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