श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

गुप्ता नृभिर्निरगमन्‍नुपलब्धुमेतद्

देव्यो यथा दिवि विमानवरैर्नृदेव्यः।

ता मातुलेयसखिभिः परिषिच्यमानाः

सव्रीडहासविकसद्वदना विरेजुः॥ १६

guptā nṛbhirniragamannupalabdhumetad

devyo yathā divi vimānavarairnṛdevyaḥ|

tā mātuleyasakhibhiḥ pariṣicyamānāḥ

savrīḍahāsavikasadvadanā virejuḥ|| 16

अर्थ

उस समय इस उत्सवको देखनेके लिये जैसे उत्तम-उत्तम विमानोंपर चढ़कर आकाशमें बहुत-सी देवियाँ आयी थीं, वैसे ही सैनिकोंके द्वारा सुरक्षित इन्द्रप्रस्थकी बहुत-सी राजमहिलाएँ भी सुन्दर-सुन्दर पालकियोंपर सवार होकर आयी थीं। पाण्डवोंके ममेरे भाई श्रीकृष्ण और उनके सखा उन रानियोंके ऊपर तरह-तरहके रंग आदि डाल रहे थे। इससे रानियोंके मुख लजीली मुसकराहटसे खिल उठते थे और उनकी बड़ी शोभा होती थी॥ १६॥

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