श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

ऋषिरुवाच

पितामहस्य ते यज्ञे राजसूये महात्मनः।

बान्धवाः परिचर्यायां तस्यासन् प्रेमबन्धनाः॥ ३

pitāmahasya te yajñe rājasūye mahātmanaḥ|

bāndhavāḥ paricaryāyāṃ tasyāsan premabandhanāḥ|| 3

अर्थ

श्रीशुकदेवजी महाराजने कहा—परीक्षित्! तुम्हारे दादा युधिष्ठिर बड़े महात्मा थे। उनके प्रेमबन्धनसे बँधकर सभी बन्धु-बान्धवोंने राजसूय यज्ञमें विभिन्‍न सेवाकार्य स्वीकार किया था॥ ३॥

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