श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.75.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 75 · अथ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

स व्रीडितोऽवाग्वदनो रुषा ज्वलन्

निष्क्रम्य तूष्णीं प्रययौ गजाह्वयम्।

हाहेति शब्दः सुमहानभूत् सता-

मजातशत्रुर्विमना इवाभवत्।

बभूव तूष्णीं भगवान् भुवो भरं

समुज्जिहीर्षुर्भ्रमति स्म यद‍्दृशा॥ ३९

sa vrīḍito'vāgvadano ruṣā jvalan

niṣkramya tūṣṇīṃ prayayau gajāhvayam|

hāheti śabdaḥ sumahānabhūt satā-

majātaśatrurvimanā ivābhavat|

babhūva tūṣṇīṃ bhagavān bhuvo bharaṃ

samujjihīrṣurbhramati sma yaddṛśā|| 39

अर्थ

इससे दुर्योधन लज्जित हो गया, उसका रोम-रोम क्रोधसे जलने लगा। अब वह अपना मुँह लटकाकर चुपचाप सभाभवनसे निकलकर हस्तिनापुर चला गया। इस घटनाको देखकर सत्पुरुषोंमें हाहाकार मच गया और धर्मराज युधिष्ठिरका मन भी कुछ खिन्‍न-सा हो गया। परीक्षित्! यह सब होनेपर भी भगवान् श्रीकृष्ण चुप थे। उनकी इच्छा थी कि किसी प्रकार पृथ्वीका भार उतर जाय; और सच पूछो तो उन्हींकी दृष्टिसे दुर्योधनको वह भ्रम हुआ था॥ ३९॥

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