॥ श्रीहरिः ॥
एतत्तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया।
सुयोधनस्य दौरात्म्यं राजसूये महाक्रतौ॥ ४०
etatte'bhihitaṃ rājan yat pṛṣṭo'hamiha tvayā|
suyodhanasya daurātmyaṃ rājasūye mahākratau|| 40
अर्थ
परीक्षित्! तुमने मुझसे यह पूछा था कि उस महान् राजसूय-यज्ञमें दुर्योधनको डाह क्यों हुआ? जलन क्यों हुई? सो वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया॥ ४०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
दुर्योधनमानभंगो नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७५॥
एतत्तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया।
सुयोधनस्य दौरात्म्यं राजसूये महाक्रतौ॥ ४०
परीक्षित्! तुमने मुझसे यह पूछा था कि उस महान् राजसूय-यज्ञमें दुर्योधनको डाह क्यों हुआ? जलन क्यों हुई? सो वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.75.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 602) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/75/40/